Friday, July 27, 2007








bottom of page
































                                                                                                              
इवजजवउ वि एंहम


सिकंदर और हिफेशियन

 


 

















 




सिकंदर महान (356 - 323 BC)


उसने इस दुनिया को जीता पर उसे जीता उसके प्रेमी
हिफेशियन ने --- वो जो उसके बचपन का दोस्त थ और कमांड में उससे दूसरे नंबर पर
था। उसके प्रसिद्ध शब ्दहिफेशियन ही सिकंदर है अब अमर हो गये हैं।





हिफेशियन
(356
BC - 324 BC)



हिफेशियन सिकंदर से भी ज़्यादा हैंडसम और उस से भी ज़्यादा बेहतर योद्धा था

जब
हिफैशियन युद्ध में मारा गया तो सिकंदर ने उसे देवता घोषित कर दिया। वो का
उस की मौत को झेल नहीं पाया और 6 महीने के अंदर ही चल बसा।




 



सिकंदर
 महान उस दौर में
पैदा हुआ था जब विश्व में पुरुष-पुरुष
प्रेम, शादी पर
जोर देने के बावजूद अभी भी बहुत ही सम्मान की दृष्टि से
देखे जाते थे, और प्राचीन यूनान में तो
पूरा
समाज ही इस प्रेम पर आधारित
था, खासतौर पर
पुरुष समाज। प्राचीन यूनान एक योद्धा
समाज था और जहां अन्य मानव
सभ्यताऐं
धीरे-धीरे पुरुष-पुरुष प्रेम को कम
महत्व दे रही थीं, वहीं प्राचीन यूनान
ने योद्धा कबीलों की
ही भांति इस प्रेम को बहुत
उंचा दर्ज़ा दिया था। वे इसे सबसे
पवित्र 
या निश्छल प्रेम मानते थे। थीबा की सेना जो
कि जिसका कोई जोड नहीं था उसमें
सिर्फ़ पुरुष
प्रेमियों के जोडे होते थे। ऐसे प्रेमी जो
जंग में साथ-साथ
लडते थे और एक दूसरे के लिये
मर मिटने का जज्बा रखते थे।
प्राचीन यूनान के महान
दर्शनशास्त्री अरस्तु का मानना
था कि पुरुषों के
सबसे महत्वपूर्ण संबंध --
चाहे वे
सामाजिक हों, यौन हों या प्रेम संबंध
हों, वे सिर्फ़ दूसरे पुरुषों के
साथ ही होते हैं।



सिकंदर महान का
जन्म 356
ई. पू. में मैसेडोनियाई राजघराने में हुआ
था। उन्होंने
किशोरावस्था में
अन्य यूनानी लडकों की भांति गुरुकुल
में शिक्षा
पाई थी और उनके गुरू स्वयं महान
अरस्तु थे जो कि स्वयं महान Iलेटो
के शषि्य हुआ करते
थे। सिकंदर महान
के लिये हमेशा से ही पट्रोक्लस
और
एचिल्स -- दो प्राचीन यूनानी योद्धा
प्रेमी युगल जिनका गुणगान यूनान ही
नहीं बाहर भी किया जाता था -- वे उनके
आदर्श
थे। अन्य यूनानी लडकों की
तरह सिकंदर ने भी एक लडके से
प्यार
किया था। यही लडका बडा होकर भी
उसका प्रेमी रहा बल्कि मरते दम तक दोनों कभी
ना जुदा हो पाने वाले प्रेमी रहे।
एक दूसरे के लिये जान भी
न्यौछावर कर देने
वाले। उनके इस प्रेमी
दोस्त का
नाम हिफेशियन था। कहावत
है कि सिकंदर महान जीवन में केवल एक
चीज से हारे -- और वह थी
हिफेशियन की
जांघ। प्राचीन यूनान में
पुरुष दूसरे पुरुष
के जांघ में लिंग को फंसा कर यौन
संबंध बनाते थे।



हिफेशियन
और सिकंदर ने साथ-साथ ही
अरस्तु के गुरुकुल में पढ़ाई की
थी। हिफेशियन भी ना
सिर्फ़
सिकंदर महान
की तरह बहुत ही बहादुर
था पर वह इतना बुद्धिमान था कि अपने गुरू
अरस्तु से तर्क वितर्क किया करता था।



हिफेशियन
और सिकंदर दोनों ही
गजब के कंदर, मर्दानी
छवि वाले थे पर
हिफेशियन इसमें
सिकंदर
से भी बढ़चढ़ कर
था। हिफेशियन आगे
चलकर
सिकंदर की
सेना में एक महत्वपूर्ण सेना नायक
बना।



सिकंदर महान
इतना बहादुर था कि जब
उसकी फौज कूच करती थी तो वह
हमेशा सबसे आगे रहता था। इसी वजह से
उसने जंग
में कई बार चोटें खायीं -- उनमें से कुछ तो बहुत
ही गंभीर थीं।



उन दोनों का
प्रेम कितना गहरा था उसका पता हमें इस प्रसिद्ध घटना से
लगता है। जब दोनों जन
अपनी फौज के
साथ पारस की रानी से
मिलने गये तो वह पहचान नहीं पायी
कि उन दोनों में
से कौन सम्राट
सिकंदर महान
है। वो बडी दुवि
ा में थी
कि क
िे पहले अभिवादन करे। और क्योंकि
हिफेशियन की कद-काठी
सिकंदर से ज़्यादा
प्रभावशाली थी उन्होंने गलती
से हिफेशियन को ही सिकंदर महान कह कर
सम्बोधित किया। पर तुरंत ही उसकी गलती उसे
बता दी गई। इस पर
रानी डर से थर्रथराने
लगी। सिकंदर ने हंस कर कहा,
"डरो मत रानी,
वो भी सिकंदर ही
है।"  



क्योंकि दोनों साथ-साथ
ही रहते और काम करते थे, वे एक दूसरे
की चिठ्ठियां भी खोल कर
पढ़ते थे। उनकी
घनिष्ठता से कई लोग जलते भी
थे और उनमें से एक
थीं सिकंदर की
माँ ओलम्पियस। एक पत्र  में
हिफेशियन
ने ओलम्पियस से
सीधे ही पूछ लिया,
"आप मुझसे
लडना बंद क्यों नहीं करतीं? वैसे मुझे कोई
फर्क भी
नहीं पडता। आप जानती हैं कि मेरे
लिये सिकंदर ही सबसे
ज़्यादा
महत्वपूर्ण है।"



सिकंदर महान
दुनिया को
फतह करते करते यूनान से पारस होते हुये भारत भी
आया। यहां उसने पोरस से युद्ध कर
के उसे हरा दिया और उत्तर पश्चिमी भारत, जो अब पाकिस्तान में
है उसके एक बडे
हिस्से पर अपना शासन
स्थापित कर
दिया था। इसी दौर में
अनेकों यूनानी लोग भारत में
आये और यहां की संस्कृति पर यूनानी संस्कृति का खासा
प्रभाव पडा -- खासतौर पर
पंजाब आदि प्रांतों में।



सिकंदर अब
गंगा के
मैदानों
को फतह करना चाहता
था। त
यहां मगध साम्राज़्य
का शासन था। यह
साम्राज़्य बहुत ही ताकतवर माना जाता
था और उससे लोहा लेना आसान
नहीं था। और सिकंदर की किस्मत ने भी साथ
नहीं दिया और उसके
िपाह
बीमारी आदि
की चपेट में आ गये। इसीलिये
सिकंदर बिना गंगा के
मैदानों की तरफ बढ़े हुये ही वापिस यूनान की
ओर कूच
कर गया।



जब सिकंदर वापिस यूनान
जा रहा था तो रास्ते में पारस के आसपास एक
युद्ध के दौरान अचानक
हिफेशियन की मौत हो
गयी। कहते हैं सिकंदर जैसे
महान योद्धा
का दुख उस समय बयान करना
मुमकिन नहीं है। वह एक
दिन से ज़्यादा समय तक
अपने दोस्त हिफेशियन की
लाश से लि
पट कर रोता रहा। अंत में हार कर
उसके अफसरों को
जबरन उसे वहां से हटाना
पडा।



इसके बाद
सिकंदर जैसे टूट ही
गया। हिफेशियन के साथ ही उसकी
आत्मा भी मर गयी थी। अब
उसमें जीने की
इच्छा ही नहीं
बची। धीरे-धीरे कर के वह बेहद बीमार होता
गया। और हिफेशियन
के
मरने के 6 महीने के अंदर ही 323
ई. पू. में बेबी
लोन में उसने भी प्राण त्याग
दिये। यों सिकंदर महान ने अपने
बचपन के
आदर्श पेट्रोक्लस
और
एचिल्स की भांति अपने योद्धा
प्रेमी के लिये जान दे दी।



मरने से पहले
उसने अपने दोस्त की याद में अपने पूरे
साम्राज़्य में
जगह जगह बडे-बडे
स्मारक बनाने की योजना बनाई
थी। मगर वह उन योजनाओं को
अंजाम देने से पहले ही मर गया।
फिर भी
उसने अपने दोस्त की याद में एक
महत्वपूर्ण कार्य को
अंजाम जरूर दिया। उसने उसे
देवता का दर्ज़ा दे दिया -- जैसा कि
प्राचीन वि
श्व में राजा को हक होता
था। यों उसने अपने बिछड़े प्रेमी के प्रति अपनी
दोस्ती न
िभायी। ये वो दुनिया
थी जहां पुरुषों के
बीच की
दोस्ती और प्रेम की बहुत
कद्र की जाती
थी। आज के विश्व में
तो दोस्ती को भी समय की बर्बादी
और परिवार आदि में
रुकावट समझा जाता है। एक
दोस्त की आज सामाजिक मान्यता कुछ भी नहीं होती। वह घर का
सदस्य
या समाज द्वारा जायज
रिश्तेदारों में
नहीं आता। इस
रिश्ते को कोई सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है।



सिकंदर के
मरने के
उपरांत उसका सारा
साम्राज़्य बि
खर गया। पर
सिकंदर इस विश्व पर
अपनी छाप छोड गया -- हमेशा, हमेशा के लिये।
इसके इतिहास पर, इसके संस्कृति पर, और इसके
र्ों पर। और दे गया इस
विश्व को एक
ऐसी प्रेम कहानी जो आज तो संसार
ने जरूर भुला दी है पर
एक दिन यही प्रेम कहानी पुरुषों को
उनकी जंजीरों से मुक्त्
करने में बहुत काम आयेगी। उन्हें अपनी
भूली हुई प्रवति की याद
दिला कर। ठीक उसी तरह जैसे की राम
और
हनुमान की कहानी।





जवए वि एंहम

 








अपनी टिप्पणी यहां लिखें

आप अपनी टिप्पणी यहाँ पोस्ट कर सकते हैँ। आप जो लिखना चाहते हैँ उसे रोमन/ इंग्लिश लिपि मैं पहले टाईप करें। जैसे अगर आप कमल लिखना चाहते हैँ तो लिखें kamal। ये पेज उसे अपने आप ही देवनागरी लिपि मैं बदल देगा।